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दुनिया_अनलॉक_होना_चाहती_है #आइये_अपना_दिल_भी_खोल_लें

दुनिया_अनलॉक_होना_चाहती_है #आइये_अपना_दिल_भी_खोल_लें

धीरेन्द्र

#दुनिया_अनलॉक_होना_चाहती_है #आइये_अपना_दिल_भी_खोल_लें

पिछले कुछ महीनों से जैसे नियम सा बन गया है कि समाचार जगत में कोरोना से जुड़ी खबर ही हैडलाइन खबरों की महत्वपूर्ण कड़ी होगी । मेरा मानना है कि इसे अब उतना ही तव्वजो देना चाहिए । जितना कुछ लोग रोज़ाना राशिफल देखकर दिनचर्या तय करते है ।

समाचारी व्यभिचारी बन चुके शीर्ष न्यूज़ अथॉरिटी धारको को कुछ हटकर चलने की जरूरत है।

सकारात्मकता लाने की जरूरत है। मसलन राशिफल ,चौघड़िया आस्थावानों को ले लीजिए, जिनकी तरह बनने की जरूरत है यानि खास समय पर खास नियमो के साथ प्रतिदिन व्यवहार करना। खास मुहूर्त ,ग्रहण काल के नियमो का पालन करना। लॉकडाउन उनके लिए ग्रहणकाल की तरह हो सकता है । सामाजिक दूरी समेत अन्य वायरस रोकथाम के लिए मान्य दिशानिर्देशो का पालन पण्डित या ज्योतिष के द्वारा सुझाये गए उपाय।

करते है न यह एक बड़े वर्ग के लोग? बड़ी शिद्दत से खुशी से,पूरी जिंदगी।

तो फिर क्या बुरा है इनसे कुछ सीखा जाए।

सामाजिक व्यवस्था में मान्य सभ्य परिधानों की तरह मास्क को भी मान्यता दे देने का विचार आपको 9 से 10 इंच लम्बे और 4 से 5 इंच चौड़े मास्क को बोझिल महसूस करने से रोकेगा। अलबत्ता रोज रंग बिरंगा मास्क पहनिए औऱ मुह ढकने का आनंद लीजिये । नए नए मास्क के साथ सेल्फी लीजिये।

नमाज़ से पहले वुज़ू, प्रसाद या आरती ग्रहण करने से पहले शुध्द हाथ की आदत तो धार्मिक मान्यताओं का गम्भीरता से अनुपालन करने वाले करते ही है। फिर क्या दिक्कत है कि हम खाने नहाने पूजा पाठ की नियमित क्रियाओं के दौरान ही,अलग से भी दो चार मर्तबा अधिक साबुन से हाथ धोये ।

गर्मी के मौसम में मुह पर कपड़ा लगाकर तो अधिकतर चलते ही हैं न,फिर क्या दिक्कत है… औऱ महिलाओ की बड़ी आबादी तो 12 माह मुह ढककर चलती है …आप ही याद कीजिये लॉक डाउन के पहले अपने कब दुपहिया चलाती किसी महिला को बिना मुखमंडल की सुरक्षा के देखा था?

गर्मी में पीलिया, सर्दी में फ्लू, बरसात में वायरल फीवर ,डेंगू, हर घर में होने वाली कॉमन बीमारी है। बिना हड़बड़ाए,बिना निर्दयी बने आप इसे परिवार के बीच रहकर ही हर मौसम में डॉक्टर के बताए उपायों खान पान के ज़रिए आसानी से झेल जाते है।

आप खुद बताइये आपने अपने जन्मकाल से लेकर अब तक एक ऐसा बरस देखा हो जब आपने हर साल आने वाली इन बीमारियो से किसी की मृत्यु की खबर न सुनी हो,जबकि इन सबकी दवाएं,टीके आपकी याददाश्त के।साथ ही हमारे बीच है।

पर आप कभी निर्दयी नही बने, किसी को यू तड़पता नही छोड़ गए, जबकि आप अस्पताल जाकर मरीज से मिल भी आये।

पर आज क्या हो गया है जब आप इतने असहिष्णु हो गए कि सड़क पर चलते मज़दूर की मदद में डर लगा। जब संक्रमण की आशंका के मद्देनजर आइसोलेटेड व्यक्ति का फोन उठाने से घबराने लगे। एक दूसरे का हाल चाल पूछने की जगह परस्पर आशाओ, खुशियो को महसूस करने की कोशिशों को कुरेदने लगे।एक दूसरे की मदद कम शिकायतों में अधिक व्यस्त रहने लगे।

यक़ीन मानिए इतना कठिन भी नही,इतना बड़ा हौव्वा भी नही है। अखबारों में छपी,न्यूज़ चैनल में दिख रही औऱ व्हाट्सएप्प पर आ रही खबरों में कोरोना पॉजिटिव की संख्या बढ़ रही हैं,तो घबराए नही। साधारण सी बात है टेस्ट बढ़ेंगे तो संख्या तो बढ़ेगी ही।

एक भी मरीज बता दीजिए जो कोरोना पॉजिटिव होकर मृत हुआ हो और उसका अन्य बीमारी का इतिहास न रहा हो। कमज़ोर को तो हर बीमारी जल्द निगल जाती है। कोरोना भी कुछ अलग नही कर रहा है। अभद्र व्यवहारिक भाषा में कहू यह एक टुच्चा सा वायरस है।इससे डरकर नही रहना ।बस सतर्क रहना जैसे हमेशा रहते है।

इस कोरोनामल की वेक्सीन आई नही है इसलिए यह बड़ा दानव लग रहा है। और अब तो वह भी ट्रायल में है। फिर क्या दिक्कत है।

रोज सब्ज़ी फल लेने जाते है न आप घर से बाहर? अब तो कुछ रोज दफ्तर भी जा रहे है…. तब कोरोना तो आपको भी हो सकता है। दूसरे के लिए इतने असहिष्णु क्यो बने बैठे है जब खुद के लिए कुछ मामलों में रियायत बक्शी है। बेचारा कोई मीलो सफर तय करके आया नही ,सोसायटी वालो ने उसे फ्लेट में कैद करवा दिया और खुद मजे से बाहर खड़े उसे बालकनी में देख रहे है।

कहने का मतलब यह है सख्ती के बावजूद अब दुनिया अब अनलॉक होना चाहती है। अपने दिल दिमाग को भी अनलॉक कर दीजिए। दर्द में सही पर मुस्कुराहट की तरफ देखिये। मुस्कुराहट बनिये,दर्द नही@धीरेन्द्र गोस्वामी(छत्तीसगढ़ के अनुभवी पत्रकार है साथ ही विचारक के रूप में पहचान रखते है ।

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